गुरुवार, 13 जुलाई 2017

बिल्व पत्र

बिल्व पत्र


बेल(बिल्व) की उत्पत्ती के संबंध में स्कंध पुराण में लिखा है कि एक बार देवी पार्वती ने अपने ललाट से पसीना पोंछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती जी, फूलों में गौरी तथा फलों में कात्यायनी निवास करती हैं।

बिल्व पत्र का महत्व
बिल्व तथा श्रीफल नाम से प्रसिद्ध (famous) यह फल बहुत ही काम का है। यह जिस पेड़ (tree) पर लगता है वह शिवद्रुम भी कहलाता है। बिल्व का पेड़ संपन्नता का प्रतीक, बहुत पवित्र तथा समृद्धि देने वाला है। बेल के पत्ते शंकर जी (shiv shanker ji) का आहार माने गए हैं, इसलिए भक्त लोग बड़ी श्रद्धा से इन्हें महादेव के ऊपर चढ़ाते हैं। शिव की पूजा के लिए बिल्व-पत्र बहुत ज़रूरी माना जाता है। शिव-भक्तों का विश्वास है कि पत्तों (leaves) के त्रिनेत्रस्वरूप् तीनों पर्णक शिव के तीनों नेत्रों को विशेष प्रिय हैं।

छह से लेकर 21 पत्तियों वाले बिल्व पत्र
ये मुख्यतः नेपाल (nepal) में पाए जाते हैं। पर भारत (india) में भी कहीं-कहीं मिलते हैं। जिस तरह रुद्राक्ष कई मुखों वाले होते हैं उसी तरह बिल्व पत्र भी कई पत्तियों वाले होते हैं।

बिल्वाष्टक और शिव पुराण
बिल्व पत्र का भगवान शंकर के पूजन (poojan) में विशेष महत्व (special importance) है जिसका प्रमाण शास्त्रों में मिलता है। बिल्वाष्टक और शिव पुराण में इसका स्पेशल उल्लेख है। अन्य कई ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। भगवान शंकर एवं पार्वती को बिल्व पत्र चढ़ाने का विशेष महत्व है।

कांटों में भी हैं शक्तियाँ
कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। ‘शिवपुराण’ में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।

बिल्व पत्र के प्रकार- बिल्व पत्र चार प्रकार के होते हैं
१- अखण्ड बिल्व पत्र
२- तीन पत्तियों के बिल्व पत्र
३- छ: से इक्कीस पत्तियों तक के बिल्व पत्र
४- श्वेत बिल्व पत्र

इन सभी बिल्व पत्रों का अपना-अपना महत्व है।

१-अखंड बिल्व पत्र
इसका विवरण बिल्वाष्टक में इस प्रकार है – ‘‘अखंड बिल्व पत्रं नंदकेश्वरे सिद्धर्थ लक्ष्मी’’। यह अपने आप में लक्ष्मी सिद्ध है। एकमुखी रुद्राक्ष के समान ही इसका अपना विशेष महत्व है। यह वास्तुदोष का निवारण भी करता है। इसे गल्ले में रखकर नित्य पूजन करने से व्यापार में चैमुखी विकास होता है।

२-तीन पत्तियों वाला बिल्व पत्र
इस बिल्व पत्र के महत्व का वर्णन भी बिल्वाष्टक में आया है जो इस प्रकार है- ‘‘त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रिधायुतम् त्रिजन्म पाप सहारं एक बिल्वपत्रं शिवार्पणम’’ यह तीन गणों से युक्त होने के कारण भगवान शिव को प्रिय है। इसके साथ यदि एक फूल धतूरे का चढ़ा दिया जाए, तो फलों (fruits) में बहुत वृद्धि होती है।

३-श्वेत बिल्व पत्र
जिस तरह सफेद सांप, सफेद टांक, सफेद आंख, सफेद दूर्वा आदि होते हैं उसी तरह सफेद बिल्वपत्र भी होता है। यह प्रकृति (nature) की अनमोल देन है। इस बिल्व पत्र के पूरे पेड़ पर श्वेत पत्ते पाए जाते हैं। इसमें हरी पत्तियां नहीं होतीं। इन्हें भगवान शंकर को अर्पित करने का विशेष महत्व है।

भगवान शंकर का प्रिय-
भगवान शंकर को बिल्व पत्र बेहद प्रिय है। भांग, धतूरा और बिल्व पत्र से प्रसन्न होने वाले केवल शिव जी ही हैं। शिवरात्रि के अवसर पर बिलवपत्रों से विशेष रूप से शिवजी की पूजा की जाती है। तीन पत्तियों वाले बिल्व पत्र आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं।

मां भगवती को बिल्व पत्र-
श्रीमद देवी भागवत मे स्पष्ट वर्णन है, कि जो व्यक्ति मां भगवती को बिल्व पत्र अर्पित करता है वह कभी भी किसी भी परिस्थती में दुखी नहीं हो सकता। उसे हर तरह की सिद्धि प्राप्त होती है और वह कई जन्मों के पापों से मुक्त हो जाता है। और वह भगवान भोलेनाथ का प्रिय भक्त हो जाता है।उसकी सभी इच्छाएं पूरी होती हैं और अंत में उसे मोक्ष की प्राप्ती होती है।

ये भी है श्रीफल-
नारियल से पहले बिल्व को श्रीफल माना जाता था और माना जाता था कि यह लक्ष्मी जी का प्रिय फल है। प्राचीन समय में बिल्व को लक्ष्मी जी और सम्पत्ती का प्रतीक मानकर लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए बिल्व पत्र की आहूती दी जाती थी। प्राचीन काल से ही बिल्व पत्र पूज्यनीय रहा है।

यह एक रामबाण दवा भी है-
धार्मिक दृष्टी से पवित्र होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर शीतल होती है। गर्मी से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्यओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों में टैनिन, लौह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।

शिव पुराण

शिव पुराण
शिव पुराण की महिमा और संहिताओं के भेद
सूत जी बोले- हे मुनीश्वरा! यह आपने त्रिलोक-हितकारी बड़ा अच्छा प्रश्न किया है। मैं आप लोगों की ऐंसी रुचि देखकर श्री गुरूजी का स्मरण कर जो कहता हुँ उसे आदर सहित सुनिए। कलिके पापों का नाश करने वाला, परमार्थदायक शिव पुराण नामक सब ग्रन्थ सब ग्रन्थों से उत्तम और वेदान्त सारका भी सर्वस्व है, जिसके पढ़ने-सुनने से मनुष्य सर्वोत्तम शिव-गति को प्राप्त होता है। जब तक इस ग्रन्थ का उदय नहीं हुआ है, तभी तक कलियुग में ब्रह्महत्यादिक पाप फैल रहें हैं। शास्त्रों के झगड़े, नाना प्रकार के उत्पात, क्रूर यम के भटों की निर्भयता, तीर्थों का विवाद, सत्य, दान और देवताओं की मान्यता सम्बन्धी विवाद तभी तक महितल पर हो रहे हैं, जब तक श्री शिव पुराण का पृथ्वी पर उदय नहीं होता है। जब यह प्रत्यक्ष हो जाआगा तब शास्त्रों के परस्पर झगड़े आदि सभी इसकी गर्जना से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि भगवान वेद व्यास के कहे हुए इस पुराण का बहुत महत्व है। इसके कीर्तन और श्रवण से जो फल प्राप्त होता है, वह सबका सब तो मैं नहीं कह सकता किंतु उसका कुछ माहात्मय मैं आप लोगों से कहता हुँ, ध्यान देकर सुनिए। इसमें मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहुँगा जो व्यास जी ने कहा है, वही कहुँगा। व्यास जी ने कहा है, यदि शिव पुराण का एक या आधा श्लोक भी कोई पढ़ेगा तो वह पाप से छूट जाऐगा और यदि सावधानी से सम्पूर्ण पढ़े तो जीवनमुक्त हो जावे और इसके अनुसार आचरण करे तो एक-एक दिन में एक-एक अश्वमेध का फल पावे। यदि कोई दूसरे भी श्री शिव पुराण की पूजा कर दे तो वह सब देवताओं की पूजा के समान फल प्राप्त करे, इसमें कोई संदेह नहीं है। क्योंकि शिव संहिता नामक इस सुधा को स्वयं श्री शिव भगवान ने उपनिषद रूपी समुद्र को मथकर उसमें से निकाला है, अत: जो इसका पान करेगा वह निश्चय ही अमर हो जावेगा। यदि कोई एक मास इसे पढ़े तो ब्रह्महत्यादिक पापों से भी वह मुक्त हो जावेगा और शिवालय में या बिल्व के वन में जो इस संहिता को पढ़ेगा वह अद्भुत फलका लाभ करेगा। जो श्री भैरव जी की मूर्ति के समक्ष इसका तीन बार पाठ करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। यदि चतुर्थीके दिन निराहार रह बिल्व की मूल में बैठकर इसे पढ़े तो शिवजी की पूजा के समान है और उसकी देवता भी पूजा करते हैं। इसमें शिवजी के दिए हुए अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पदार्थों का विवेचन और उनकी प्राप्ति के उपाय तथा शिवजी की लीला और विज्ञान सब कुछ निहित है; अतएव यह सब प्रकार आदरणीय है। वेद और श्री ब्रह्मा जी की सम्मति के अनुसार श्री शिव जी ने ही पहले इस श्री शिव पुराण की रचना की जिसमें १ विद्येश्वर-संहिता २ रुद्र-संहिता ३ विनायक-संहिता ४ उमा-संहिता ५ मातृ-संहिता ६ एकादश रुद्र-संहिता ७ कैलाश-संहिता ८ शत रुद्र-संहिता ९ कोटि रुद्र-संहिता १० सहस्त्र कोटि रुद्र-संहिता ११ वायवीय-संहिता और १२ धर्म-संहिताएँ आदि इस पुराण में सम्मिलित हैं। ये सभी पुण्यतर हैं। इनमें २ विद्येश्वर, २ रुद्र, ३ विनायक ये तीनों संहिताएं दस-दस हजार तथा उमा और मातृ ये दोनो आठ-आठ हजार और एकादश रुद्र-संहिता तेरह हजार, कैलाश-संहिता छ: हजार, शत रुद्र-संहिता तीन हजार, कोटि रुद्र नौ हजार, सहस्त्र कोटि रुद्र ग्यारह हजार, वायवीय-संहिता दश हजार, और धर्म-संहिता बारह हजार कुल एक लाख श्लोकों का यह शिव पुराण है। परन्तु इसे शिवजी ने अब केवल चौबीस हजार का ही सब के लिए रख दिया है और पुराणों में यह चौथा पुराण कहा जाता है। परन्तु अब इसमें सात संहिताएं ही प्रधान हैं; अन्यथा सृष्टि के आरम्भ में शिवजी नें इसे सौ करोड़ श्लोकों में कहा था। अब यह चैबीस हजार संख्याओं वाला शिव पुराण केवल इन सात संहिताओं में ही शेष रह गया है। यथा १ विद्येश्वर-संहिता २ रुद्र-संहिता ३ शत रुद्र-संहिता ४ श्री कोटि रुद्र-संहिता श्री उमा-संहिता ६ श्री कैलाश-संहिता और ७ वायवीय-संहिता। जो इस सप्त संहिता युक्त श्री शिव महा पुराण को आदर सहित पूरा पढ़ेगा वह जीवन मुक्त हो जाएगा। यह सब पुराणों का तिलक और सब जीवों का कल्याण दाता है। इसमें वेदान्त और विज्ञान सब कुछ पूर्ण रूप से निहित है। इसे परमादर से पढ़ने वाला शम्भू-प्रिय हो परमगति को लाभ करता है।

श्री शिव महापुराण विद्येश्वर-संहिता का  दूसरा अध्याय समाप्त।।२।।

साभार- ठाकुरप्रसाद पुस्तक भंडार 



NOTE- यह जानकारी लोगों के ज्ञान को बढ़ाने के लिए है। यह जानकारी ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार की शिव महापुराण नामक पुस्तक से लेकर इस ब्लॉग में लिखी गई है अगर किसी व्यक्ति या समूह को इससे कोई आपत्ती है तो कृपया कमेंट में जरूर लिखें। हमारा पोस्ट लिखने का उद्देश्य प्रकाशक की कृति को चुराना नहीं बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाना है।

बुधवार, 5 जुलाई 2017

शिव पुराण

  पहला अध्याय
   तीर्थराज प्रयाग में मुनियों का सम्मेलन
श्री व्यास जी कहते हैं- एक समय श्री गंगा जी और कालिंदी के पवित्र संगम महाक्षेत्र परम-पावन प्रयाग में मुनियों ने अपना एक विराट सम्मेलन किया। इस विराट सम्मेलन में महर्षि व्यास के परम पौराणिक सूत जी भी पधारे। उनके आगमन पर समस्त मुनियों ने अपने स्थान से उठकर उनकी यथोचित अभ्यर्थना की तथा पूजा-सत्कार करके हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की कि हे मुनिश्वर कलियुग में सभी प्राणी पापयुक्त हो सत्कर्म से रहित, परनिन्दक, चोर, पर-स्त्री गामी, दूसरों की हत्या करने वाले, देहाभिमानी, आत्मज्ञान से रहित, नास्तिक माता-पिता से द्वेष करने वाले, और स्त्रियों के दास हो जाएंगे तथा किसी में भी धर्म नहीं रह जाएगा। ब्राह्मण लोभी वेद को बेचकर जीविका करने वाले, धन के इच्छुक और मद से मोहित अपनी जाति के कर्मों को छोड़कर त्रिकाल संध्या न करने वाले ब्रह्म ज्ञान से रहित, दयाहीन, आचार और व्रत को लोप करने वाले, कृषक, क्रूर और मलिन स्वभाव के हो जाएंगे। क्षत्रिय भी धर्म के विपरीत, कुसंगी और पाप-परायण हो जाएंगे। रण से कायरता, धर्म से विमुखता, चारी, नीचता और दासता ही मानो उनका धर्म रह जाएगा। भोगों की लिप्सा और कामनियों की दासता उनके जीवन का मुख्य ध्येय होगा तथा गोसेवा तथा शरणागत की रक्षा से विरत हो जाएंगे प्रजा पालन से दूर और जीव हिंसा में उनकी बड़ी रुचि हो जाएगी। इसी प्रकार वैश्य भी संस्कार हीन, अपने धर्म से रहित, कुमार्गी और जैसे भी हो डंडी मारकर केवल धन कमाना ही अपना मुख्य धर्म समझेंगे ऐर वे भी किसी अन्य की ओर कदापि ध्यान नहीं देंगे। वे गुरू, देवता और ब्राह्मणों से रहित, कामी, मलिन आशय वाले, मोहाछन्न और परम लोभी होंगे। ऐसे ही शूद्र भी अपने धर्म को छोड़ तिलक छाप लगा ब्राह्मणों का सा आचार करने वाले, नकली तपस्वी, ब्राह्मणों के तेजहर्ता, शालिग्राम ईदि पाषाण पूजक, होम-कर्ता, कुटिल ब्राह्मणों के निन्दक, धनवान, कुकर्मी, विद्वान, विवादी, धर्मलोपक, राजाकृत, दंभी महाभिमानी, क्रूर, वर्ण-धर्म के नाशक, सर्व वर्णों से उच्च और दुष्कर्मी हो जाएंगे। इसी प्रकार स्त्रियों में भी धर्म का ह्रास हो जाएगा और वे तमो गुण से युक्त जारवासी, पति से विमुख, माता-पिता की भक्ति से रहित, दुराशय युक्त और नित्य रुग्णा रहा करेगीं। तब ऐसी नष्ट बुद्धी संतानों की लोक-परलोक में क्या दशा होगी तथा वे किस उपाय से सदगति को प्राप्त होंगे- हे सूत जी! इस सम्मेलन में आप इस पर प्रकाश डालिए। क्योंकि हम सब को इस बात की बहुत चिंता है कि जगत की आगे क्या दुर्दशा होगी। परोपकार से बढ़कर दूसरा धर्म नहीं है; अत: इसके लिए जो सर्व सिद्धांतों से मान्य हो- ऐसी कोई सरल युक्ति आप बतलाने कृपा कीजिए। व्यास जी कहते हैं कि मुनियों की ऐसी बातें सुनकर परम पौराणिक सूत जी अपने मनमें भगवान शंकर का ध्यान करते हुए बोले- 

"श्री शिव महा पुराण विद्देश्वर संहिता का पहला अध्याय समाप्त"
                                        साभार- ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार


NOTE- यह जानकारी लोगों के ज्ञान को बढ़ाने के लिए है। यह जानकारी ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार की शिव महापुराण नामक पुस्तक से लेकर इस ब्लॉग में लिखी गई है अगर किसी व्यक्ति या समूह को इससे कोई आपत्ती है तो कृपया कमेंट में जरूर लिखें। हमारा पोस्ट लिखने का उद्देश्य प्रकाशक की कृति को चुराना नहीं बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाना है।

सोमवार, 24 अप्रैल 2017

Jagannath Puri

उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से 60 किलोमीटर दूर दक्षिण में स्थित है पुरी। पुरी को जगन्नाथ भगवान के विश्व प्रसिद्ध मंदिर के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण गंग वंश के राजा अनंतवर्मन चोडगंग ने अपने शासनकाल में करवाया था, जिसे बाद में उनके पोते अनंगभीम देव ने 1174 में पून: उस रूप में बनवाया, जैसा आज हम इसे देखते हैं। अनंतवर्मन नें ही कोणार्क के सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। मंदिर भारत के विश्व प्रसिद्ध चार धामों में से एक है। प्रतिवर्ष पूरी दुनिया से लोग जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा में हिस्सा लेने आते हैं।
रथ यात्रा 
जगन्नाथ मंदिर, जगन्नाथ भगवान का मंदिर है। जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ की नीम की लकड़ी से बनी प्रतिमा होती है, जिसे हर 12 से 19 साल के बीच एक खास दिन बदला जाता है। इसके लिए एक विशेष प्रकार के नीम के पेड़ को काटकर पुरी भेजा जाता है, जहाँ पर उसे तराश कर उससे भगवान जगन्नाथ की प्रतिमा बनायी जाती है। इसके बाद मंदिर के मुख्य पुजारी पुरानी प्रतिमा में से एक विशेष पदार्थ जिसे दिव्य पदार्थ कहते हैं, निकालकर नयी प्रतिमा में स्थापित करते हैं। किसी को भी नहीं पता कि वो पदार्थ क्या है, लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि वो भगवान बुद्ध के अवशेष हैं, जिन्हे आज तक सम्भाल कर रखा गया है। नयी प्रतिमा में दिव्य पदार्थ को स्थापित करने के बाद पुरानी प्रतिमा को मंदिर में ही किसी निश्चित जगह पर पूरे सम्मान के साथ दफना दिया जाता है
जगन्नाथ स्वामी 
इसके निर्माण के बाद से अब तक इस मंदिर पर 18 बार आक्रमण हो चुका है। पहली बार इस मंदिर पर आक्रमण रक्तवाहू नें किया था। मुगल बादशाह औरंगजेब नें भी इस पर आक्रमण किया था, जिसके बाद यह कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया था, लेकिन 1707 में औरंगजेब की मृत्यू के बाद इसे पुन: खोल दिया गया था।
स्वामी जगन्नाथ मंदिर 

स्वामी जगन्नाथ मंदिर के बारे में कई मान्यताएं प्रचलित हैं-
1- मंदिर के ऊपर से किसी पक्षी का न उड़ना
कहा जाता है कि इस मंदिर के ऊपर से कभी भी न तो कोई पक्षी और न ही कोई विमान उड़ता है। किसी को नहीं पता की एेसा क्यों होता है। कुछ लोग मानते हैं कि ऐसा भगवान की उपस्थिति के कारण होता है। मगर कुछ लोग इसे केवल एक कोरी कल्पना मानते हैं।

2-



























                             

बुधवार, 15 मार्च 2017

हिंदु धर्म के 7 व्यक्ति जो अमर हैं

हिन्दु धर्म में 7 अमर व्यक्ति। जी हाँ हिन्दु धर्म ग्रंथो के मुताबिक हिन्दु धर्म में एेंसे सात व्यक्ति हैं जिन्हे अमरता का वरदान प्राप्त है। हिन्दु धर्म के ग्रंथों में एक श्लोक है जो इस प्रकार है-


अस्वत्थामा बलिर व्यासो हनुमानस्य च विभीषण:।
कृपाचार्या च परशुरामम् सपतईता चिरंजीवनम।।

इस श्लोक में कहा गया है, कि अस्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम ऐंसे सात व्यक्ति हैं जिन्हे चिरंजीव होने का वरदान प्राप्त है। इन लोगों के बारे में नीचे जानकारी दी जा रही है-

1- अस्वत्थामा- ये बात तो सब जॉनते हॉे कि अस्वत्थामा कोरवों और पांडवों के गुरू दोण और कृपाचार्य की बहिन कृपि के पुत्र थे, और महाभारत के युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। कहा जाता है कि इस युद्ध में और इस युद्ध के बाद केवल दो ही ऐंसे लोग थे जो जिंदा बचे थे। उनमें से एक कृपाचार्य थे और दूसरा था अस्वत्थामा। कहा जाता है कि अस्वत्थामा के पास एक मणि थी जिसे वह अपने माथे पर धारण करता था। अस्वत्थामा भगवान शिव का भक्त था और हथियारों का बहुत बड़ा जानकार था। कहा जाता है कि अस्वत्थामा 64 प्रकार की युद्धकला मे माहिर था। कुछ लोगों का मानना है कि वह कलयुग में द्वितीय व्यास और सप्तऋषि बनेगा। एक प्रचलित मान्यता के अनुसार अस्वत्थामा शिव जी के मंदिर पर प्रतिदिन फूल चढ़ाने के लिए जाता है, हालांकि आज तक किसी ने उसे वहां आते और फूल चढ़ाते हुए नहीं देखा।

2- बलि- बलि प्रहलाद का वंशज था बलि राक्षस होने के बावजूद धर्म में आस्था रखता था इसका साम्राज्य उत्तर में विंध्य से दक्षिण में केरल तक फैला था। इसके साम्राज्य की राजधानी केरल थी। इसके बारे में एक कहानी बहुत प्रचलित है, कहा जाता है कि एक बार भगवान विष्णु बलि की परिक्षा लेने धरती पाए और उन्होने एक बालक का वेश बनाया। जब वो बलि के दरबार म्ं गए तो बलि नें उनसे कुछ भी मागनें को कहा। तब भगवान विष्णु नें जो कि एक बालक के रूप में थे बलि से तीन पग जगह देने को कहा, बलि ने उनकी बात मान ली और उन्हे तीन पग जगह नापने के लिए कहा, लेकिन जब उन्होने नापना शुरू किया तो उन्होने पृथ्वी और आकाश को केवल दो कदमों से नाप लिया और जब तीसरे पैर के लिए कोई जगह नहीं बची तब बलि नें उनसे कहा कि वे तीसरा पग उसके सिर पर रखें। भगवान नें उसका निवेदन स्वीकार कर लिया और तीसरा पैर उसके सिर पर रख दिया जिससे वो सीधा पाताल में पहुँच गया। भगवान ने बलि की इस दानवीरता से प्रसन्न होकर उसे अमरता का वरदान दिया।