बुधवार, 5 जुलाई 2017

शिव पुराण

  पहला अध्याय
   तीर्थराज प्रयाग में मुनियों का सम्मेलन
श्री व्यास जी कहते हैं- एक समय श्री गंगा जी और कालिंदी के पवित्र संगम महाक्षेत्र परम-पावन प्रयाग में मुनियों ने अपना एक विराट सम्मेलन किया। इस विराट सम्मेलन में महर्षि व्यास के परम पौराणिक सूत जी भी पधारे। उनके आगमन पर समस्त मुनियों ने अपने स्थान से उठकर उनकी यथोचित अभ्यर्थना की तथा पूजा-सत्कार करके हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना की कि हे मुनिश्वर कलियुग में सभी प्राणी पापयुक्त हो सत्कर्म से रहित, परनिन्दक, चोर, पर-स्त्री गामी, दूसरों की हत्या करने वाले, देहाभिमानी, आत्मज्ञान से रहित, नास्तिक माता-पिता से द्वेष करने वाले, और स्त्रियों के दास हो जाएंगे तथा किसी में भी धर्म नहीं रह जाएगा। ब्राह्मण लोभी वेद को बेचकर जीविका करने वाले, धन के इच्छुक और मद से मोहित अपनी जाति के कर्मों को छोड़कर त्रिकाल संध्या न करने वाले ब्रह्म ज्ञान से रहित, दयाहीन, आचार और व्रत को लोप करने वाले, कृषक, क्रूर और मलिन स्वभाव के हो जाएंगे। क्षत्रिय भी धर्म के विपरीत, कुसंगी और पाप-परायण हो जाएंगे। रण से कायरता, धर्म से विमुखता, चारी, नीचता और दासता ही मानो उनका धर्म रह जाएगा। भोगों की लिप्सा और कामनियों की दासता उनके जीवन का मुख्य ध्येय होगा तथा गोसेवा तथा शरणागत की रक्षा से विरत हो जाएंगे प्रजा पालन से दूर और जीव हिंसा में उनकी बड़ी रुचि हो जाएगी। इसी प्रकार वैश्य भी संस्कार हीन, अपने धर्म से रहित, कुमार्गी और जैसे भी हो डंडी मारकर केवल धन कमाना ही अपना मुख्य धर्म समझेंगे ऐर वे भी किसी अन्य की ओर कदापि ध्यान नहीं देंगे। वे गुरू, देवता और ब्राह्मणों से रहित, कामी, मलिन आशय वाले, मोहाछन्न और परम लोभी होंगे। ऐसे ही शूद्र भी अपने धर्म को छोड़ तिलक छाप लगा ब्राह्मणों का सा आचार करने वाले, नकली तपस्वी, ब्राह्मणों के तेजहर्ता, शालिग्राम ईदि पाषाण पूजक, होम-कर्ता, कुटिल ब्राह्मणों के निन्दक, धनवान, कुकर्मी, विद्वान, विवादी, धर्मलोपक, राजाकृत, दंभी महाभिमानी, क्रूर, वर्ण-धर्म के नाशक, सर्व वर्णों से उच्च और दुष्कर्मी हो जाएंगे। इसी प्रकार स्त्रियों में भी धर्म का ह्रास हो जाएगा और वे तमो गुण से युक्त जारवासी, पति से विमुख, माता-पिता की भक्ति से रहित, दुराशय युक्त और नित्य रुग्णा रहा करेगीं। तब ऐसी नष्ट बुद्धी संतानों की लोक-परलोक में क्या दशा होगी तथा वे किस उपाय से सदगति को प्राप्त होंगे- हे सूत जी! इस सम्मेलन में आप इस पर प्रकाश डालिए। क्योंकि हम सब को इस बात की बहुत चिंता है कि जगत की आगे क्या दुर्दशा होगी। परोपकार से बढ़कर दूसरा धर्म नहीं है; अत: इसके लिए जो सर्व सिद्धांतों से मान्य हो- ऐसी कोई सरल युक्ति आप बतलाने कृपा कीजिए। व्यास जी कहते हैं कि मुनियों की ऐसी बातें सुनकर परम पौराणिक सूत जी अपने मनमें भगवान शंकर का ध्यान करते हुए बोले- 

"श्री शिव महा पुराण विद्देश्वर संहिता का पहला अध्याय समाप्त"
                                        साभार- ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार


NOTE- यह जानकारी लोगों के ज्ञान को बढ़ाने के लिए है। यह जानकारी ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार की शिव महापुराण नामक पुस्तक से लेकर इस ब्लॉग में लिखी गई है अगर किसी व्यक्ति या समूह को इससे कोई आपत्ती है तो कृपया कमेंट में जरूर लिखें। हमारा पोस्ट लिखने का उद्देश्य प्रकाशक की कृति को चुराना नहीं बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाना है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें