गुरुवार, 13 जुलाई 2017

शिव पुराण

शिव पुराण
शिव पुराण की महिमा और संहिताओं के भेद
सूत जी बोले- हे मुनीश्वरा! यह आपने त्रिलोक-हितकारी बड़ा अच्छा प्रश्न किया है। मैं आप लोगों की ऐंसी रुचि देखकर श्री गुरूजी का स्मरण कर जो कहता हुँ उसे आदर सहित सुनिए। कलिके पापों का नाश करने वाला, परमार्थदायक शिव पुराण नामक सब ग्रन्थ सब ग्रन्थों से उत्तम और वेदान्त सारका भी सर्वस्व है, जिसके पढ़ने-सुनने से मनुष्य सर्वोत्तम शिव-गति को प्राप्त होता है। जब तक इस ग्रन्थ का उदय नहीं हुआ है, तभी तक कलियुग में ब्रह्महत्यादिक पाप फैल रहें हैं। शास्त्रों के झगड़े, नाना प्रकार के उत्पात, क्रूर यम के भटों की निर्भयता, तीर्थों का विवाद, सत्य, दान और देवताओं की मान्यता सम्बन्धी विवाद तभी तक महितल पर हो रहे हैं, जब तक श्री शिव पुराण का पृथ्वी पर उदय नहीं होता है। जब यह प्रत्यक्ष हो जाआगा तब शास्त्रों के परस्पर झगड़े आदि सभी इसकी गर्जना से समाप्त हो जाएंगे। क्योंकि भगवान वेद व्यास के कहे हुए इस पुराण का बहुत महत्व है। इसके कीर्तन और श्रवण से जो फल प्राप्त होता है, वह सबका सब तो मैं नहीं कह सकता किंतु उसका कुछ माहात्मय मैं आप लोगों से कहता हुँ, ध्यान देकर सुनिए। इसमें मैं अपनी ओर से कुछ नहीं कहुँगा जो व्यास जी ने कहा है, वही कहुँगा। व्यास जी ने कहा है, यदि शिव पुराण का एक या आधा श्लोक भी कोई पढ़ेगा तो वह पाप से छूट जाऐगा और यदि सावधानी से सम्पूर्ण पढ़े तो जीवनमुक्त हो जावे और इसके अनुसार आचरण करे तो एक-एक दिन में एक-एक अश्वमेध का फल पावे। यदि कोई दूसरे भी श्री शिव पुराण की पूजा कर दे तो वह सब देवताओं की पूजा के समान फल प्राप्त करे, इसमें कोई संदेह नहीं है। क्योंकि शिव संहिता नामक इस सुधा को स्वयं श्री शिव भगवान ने उपनिषद रूपी समुद्र को मथकर उसमें से निकाला है, अत: जो इसका पान करेगा वह निश्चय ही अमर हो जावेगा। यदि कोई एक मास इसे पढ़े तो ब्रह्महत्यादिक पापों से भी वह मुक्त हो जावेगा और शिवालय में या बिल्व के वन में जो इस संहिता को पढ़ेगा वह अद्भुत फलका लाभ करेगा। जो श्री भैरव जी की मूर्ति के समक्ष इसका तीन बार पाठ करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। यदि चतुर्थीके दिन निराहार रह बिल्व की मूल में बैठकर इसे पढ़े तो शिवजी की पूजा के समान है और उसकी देवता भी पूजा करते हैं। इसमें शिवजी के दिए हुए अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष चारों पदार्थों का विवेचन और उनकी प्राप्ति के उपाय तथा शिवजी की लीला और विज्ञान सब कुछ निहित है; अतएव यह सब प्रकार आदरणीय है। वेद और श्री ब्रह्मा जी की सम्मति के अनुसार श्री शिव जी ने ही पहले इस श्री शिव पुराण की रचना की जिसमें १ विद्येश्वर-संहिता २ रुद्र-संहिता ३ विनायक-संहिता ४ उमा-संहिता ५ मातृ-संहिता ६ एकादश रुद्र-संहिता ७ कैलाश-संहिता ८ शत रुद्र-संहिता ९ कोटि रुद्र-संहिता १० सहस्त्र कोटि रुद्र-संहिता ११ वायवीय-संहिता और १२ धर्म-संहिताएँ आदि इस पुराण में सम्मिलित हैं। ये सभी पुण्यतर हैं। इनमें २ विद्येश्वर, २ रुद्र, ३ विनायक ये तीनों संहिताएं दस-दस हजार तथा उमा और मातृ ये दोनो आठ-आठ हजार और एकादश रुद्र-संहिता तेरह हजार, कैलाश-संहिता छ: हजार, शत रुद्र-संहिता तीन हजार, कोटि रुद्र नौ हजार, सहस्त्र कोटि रुद्र ग्यारह हजार, वायवीय-संहिता दश हजार, और धर्म-संहिता बारह हजार कुल एक लाख श्लोकों का यह शिव पुराण है। परन्तु इसे शिवजी ने अब केवल चौबीस हजार का ही सब के लिए रख दिया है और पुराणों में यह चौथा पुराण कहा जाता है। परन्तु अब इसमें सात संहिताएं ही प्रधान हैं; अन्यथा सृष्टि के आरम्भ में शिवजी नें इसे सौ करोड़ श्लोकों में कहा था। अब यह चैबीस हजार संख्याओं वाला शिव पुराण केवल इन सात संहिताओं में ही शेष रह गया है। यथा १ विद्येश्वर-संहिता २ रुद्र-संहिता ३ शत रुद्र-संहिता ४ श्री कोटि रुद्र-संहिता श्री उमा-संहिता ६ श्री कैलाश-संहिता और ७ वायवीय-संहिता। जो इस सप्त संहिता युक्त श्री शिव महा पुराण को आदर सहित पूरा पढ़ेगा वह जीवन मुक्त हो जाएगा। यह सब पुराणों का तिलक और सब जीवों का कल्याण दाता है। इसमें वेदान्त और विज्ञान सब कुछ पूर्ण रूप से निहित है। इसे परमादर से पढ़ने वाला शम्भू-प्रिय हो परमगति को लाभ करता है।

श्री शिव महापुराण विद्येश्वर-संहिता का  दूसरा अध्याय समाप्त।।२।।

साभार- ठाकुरप्रसाद पुस्तक भंडार 



NOTE- यह जानकारी लोगों के ज्ञान को बढ़ाने के लिए है। यह जानकारी ठाकुर प्रसाद पुस्तक भंडार की शिव महापुराण नामक पुस्तक से लेकर इस ब्लॉग में लिखी गई है अगर किसी व्यक्ति या समूह को इससे कोई आपत्ती है तो कृपया कमेंट में जरूर लिखें। हमारा पोस्ट लिखने का उद्देश्य प्रकाशक की कृति को चुराना नहीं बल्कि उसे जन-जन तक पहुँचाना है।

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